Tuesday, September 30, 2014

बवासीर, कारण, लक्षण एवं आयुर्वेद चिकित्सा


पाइल्स से परेशान हैं? पढ़िए इसे...

बवासीर

क्या होते हैं पाइल्स
बवासीर या पाइल्स को मेडिकल भाषा में हेमरॉइड्स के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुदा (ऐनस) के अंदरूनी और बाहरी क्षेत्र और मलाशय (रेक्टम) के निचले हिस्से की शिराओं में सूजन आ जाती है। इसकी वजह से ऐनस के अंदर और बाहर या किसी एक जगह मस्से जैसी स्थिति बन जाती है, जो कभी अंदर रहते हैं और कभी बाहर भी आ जाते हैं। करीब 70 फीसदी लोगों को अपने जीवन में किसी न किसी वक्त पाइल्स की समस्या रही है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ पाइल्स की समस्या बढ़ सकती है। अगर परिवार में किसी को यह समस्या रही है तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। आनुवांशिक समस्या है।

फिशर: आमतौर पर गुदा से संबधित सभी रोगों को बवासीर या पाइल्स ही समझ लिया जाता है, लेकिन इसमें कई और रोग भी हो सकते हैं। हो सकता है, जिन्हें आप पाइल्स समझ रहे हैं, वे फिशर हों। कई बार एनल कैनाल के आसपास के क्षेत्र में एक क्रैक जैसी स्थिति बन जाती है, जिसे फिशर कहते हैं। यह क्रैक छोटे भी हो सकते हैं और इतने बड़े भी कि इनसे खून आने लगे।

लक्षण

आमतौर पर पाइल्स बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होते और तीन-चार दिन में अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। कई बार तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि उन्हें पाइल्स हैं। वैसे पाइल्स के यह लक्षण हो सकते हैं:-
-ऐनस के इर्द-गिर्द एक कठोर गांठ जैसी महसूस हो सकती है। इसमें ब्लड हो सकता है, जिसकी वजह से इनमें काफी दर्द होता है।
-टॉयलेट के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट साफ नहीं हुआ है।
- मल त्याग के वक्त लाल चमकदार रक्त का आना।
- मल त्याग के वक्त म्यूकस का आना और दर्द का अहसास होना।
- ऐनस के आसपास खुजली होना और उस क्षेत्र का लाल और सूजन आ जाना।

पाइल्स के प्रकार
अंदरूनी-
स्टेज 1: शुरुआती स्थिति में ऐनस के भीतर छोटी-सी सूजन जैसी होती है। आमतौर पर यह दिखाई भी नहीं देती। इनमें दर्द नहीं होता। बस मरीज मल त्याग के वक्त या जोर लगाने पर खून आने की शिकायत करता है।
स्टेज 2: पहली स्थिति से ज्यादा सूजन होती है। मल त्याग के वक्त जोर लगाने पर खून के साथ मस्से बाहर आ जाते हैं, लेकिन हाथ से अंदर करने पर वापस चले जाते हैं।
स्टेज 3: तीसरी तरह की स्थिति गंभीर होती है। इसमें सूजन वाला हिस्सा या मस्सा बाहर की ओर लटका रहता है और उसे उंगली की मदद से भी अंदर नहीं किया जा सकता। यह बड़े होते हैं और हमेशा बाहर की ओर निकले रहते हैं। अंदरूनी पाइल्स को ही खूनी बवासीर कहा जाता है। सेकंड या थर्ड स्टेज पाइल्स में कोई भी तेल लगाकर शौच के बाद मस्सों को अंदर कर दें। बाहर रहने से इंफेक्शन का डर रहता है।

बाहरी-
इसे मेडिकल भाषा में पेरिएनल हेमाटोमा कहा जाता है। यह छोटी-छोटी गांठें या सूजन जैसे होते हैं, जो ऐनस की बाहरी परत पर स्थित होते हैं। इनमें बहुत ज्यादा खुजली होती है। अगर इनमें रक्त भी जमा हो जाए तो दर्द होता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है।

वजहें
लगातार रहने वाली और पुरानी कब्ज और मल त्याग में ज्यादा जोर लगाना।
गुदा मैथुन।
लगातार और बार-बार होने वाला डायरिया।
ज्यादा वजन लगातार उठाना।
मोटापा।
प्रेग्नेंसी में भी कई बार पाइल्स की समस्या हो जाती है।

यह भी ध्यान रखें-
कब्ज पाइल्स की सबसे प्रमुख वजह है। इससे बचने के लिए भरपूर हरी और रेशेदार सब्जियां खाएं, ताजे फल खाएं और खूब पानी पिएं। इससे मल सॉफ्ट होगा जिससे जोर नहीं लगाना पड़गा।
सॉफ्ट और नमी वाले टॉयलेट पेपर का प्रयोग करें और पोंछने की बजाय पेपर से थपथपाएं।
ढीले अंडरवेयर पहनें। टाइट अंडरवेयर की वजह से पाइल्स पर रगड़ आ सकती है, जिससे दिक्कत होगी।
पाइल्स के मरीज को मल त्याग के बाद भी ऐसा लगता रहता है जैसे अभी और मल आना बाकी है। इसके लिए वे जोर लगाते हैं, जो नुकसानदायक हो सकता है। मल और आने की सेंसेशन उन्हें पाइल्स की वजह से ही होती है, जबकि असल में पेट साफ हो चुका होता है। जोर लगाने से बचें।
कोशिश करें, टॉयलेट में एक से डेढ़ मिनट के भीतर फारिग होकर आ जाएं।
टॉयलेट में बैठकर पेपर या कोई किताब न पढ़ें।


इलाज के तरीके
ऐलोपैथी
ऐलोपैथी में इलाज के मोटे तौर पर तीन तरीके हैं:
1. दवाओं से:
अगर पाइल्स ग्रेड 1 या ग्रेड 2 के हैं यानी आकार में छोटे हैं तो दवाओं से उन्हें ठीक किया जा सकता है। खाने और लगाने दोनों की ही दवाएं दी जाती हैं। पाइल्स की शुरुआती स्टेज में इसी तरीके से इलाज हो जाता है।

एनोवेट (Anovate), प्रॉक्टोसिडिल (Proctosedyl), फकटू (Faktu) पाइल्स पर लगाने की दवाएं हैं। इनमें से किसी एक दवा का इस्तेमाल कर सकते हैं। दवा को दिन में तीन बार लगाएं। अगर अंदरूनी पाइल्स है तो ट्यूब के साथ दिए गए ऐप्लिकेटर या उंगली की मदद से दवा लगाएं और हर बार दवा लगाने के बाद ऐप्लिकेटर को धो लें। इन दवाओं का लम्बे समय तक इस्तेमाल न करें। कोई भी दवा डॉक्टर से सलाह के बाद ही यूज करें।

इसमें खुजली होती है। खुजाने से मर्ज बढ़ जाता है। ऐसे में ऊपर बताई गई किसी एक क्रीम का इस्तेमाल करें।

2. अस्पताल में भर्ती हुए बिना इलाज:
अगर दवाओं से पाइल्स ठीक नहीं हो रहे हैं तो यह तरीके अपनाए जाते हैं। इसमें दो तकनीक चलन में हैं।

एंडोस्कोपिक स्केलरोथेरपी या इंजेक्शन थेरपी: इसमें मरीज को एक इंजेक्शन दिया जाता है। इससे मस्से सिकुड़ जाते हैं और ठीक हो जाते हैं। यह डे केयर प्रोसेस है। अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती। एक बार इंजेक्शन देने से कुछ मस्से ठीक हो जाते हैं। महीने भर के बाद मरीज को दोबारा बुलाया जा सकता है और फिर उसे इंजेक्शन दिया जाता है। कितनी बार बुलाकर इंजेक्शन दिया जाएगा, यह पूरी तरह मरीज की दशा पर निर्भर करेगा। यह तरीका भी ग्रेड 1 या ग्रेड 2 के पाइल्स में ही अपनाया जाता है।
खर्च: एक बार इंजेक्शन देने के प्रोसेस का खर्च करीब तीन हजार रुपये आता है।

रबर बैंड लीगेशन: इस प्रक्रिया में पाइल्स की जड़ों में बैंड लगाया जाता है। यह बैंड खून के संचरण को रोक देता है और मस्से सूख जाते हैं। कोई एनस्थीजिया नहीं दिया जाता। डे केयर प्रोसेस है। एक बार बैंडिंग करने से कुछ पाइल्स ठीक हो जाते हैं। अगर ठीक नहीं होते तो मरीज को दोबारा बुलाया जा सकता है। मरीज की कंडिशन के आधार पर उसे दो बार से ज्यादा भी इस प्रक्रिया को कराना पड़ सकता है।
खर्च: इसमें भी एक बार का खर्च तीन हजार रुपये के करीब ही बैठता है।

3. सर्जरी
सर्जरी में भी आजकल दो तरीके अपनाए जा रहे हैं।

हेमरॉयडेक्टमी: मस्से बहुत बड़े आकार के हैं और इलाज के दूसरे तरीके फेल हो चुके हैं तो परंपरागत तरीके से ओपन सर्जरी की जाती है, जिसमें अंदरूनी या बाहरी मस्सों को सर्जरी के जरिए काटकर निकालना पड़ता है। इस प्रक्रिया को हेमरॉयडेक्टमी कहते हैं। जनरल एनैस्थीजिया देकर सर्जरी की जाती है। सर्जरी के बाद इसमें मरीज को काफी दर्द का अनुभव होता है और रिकवर होने में भी थोड़ा ज्यादा वक्त लग जाता है।

एमआईपीएच: इस तरीके में मरीज को दर्द कम होता है, खून कम होता है और उसकी रिकवरी जल्दी हो जाती है। इसके अलावा इंफेक्शन के चांस भी कम होते हैं। इसे करने में 30 से 40 मिनट का वक्त लगता है। एनैस्थीजिया दिया जाता है। यह लोकल, रीजनल या जनरल भी हो सकता है। इस तरीके को स्टेपलर हेमरॉयडेक्टमी या स्टेपलर पाइल्स सर्जरी भी कहते हैं। इस में भी एक से दो दिन रुकना पड़ता है।

आयुर्वेद

आयुर्वेद में मोटे तौर पर दो तरह से इलाज किया जाता है।

दवाओं से इलाज
अगर स्टेज 1 के पाइल्स हैं तो मरीज को पेट साफ करने की और मस्सों पर लगाने की दवाएं दी जाती हैं, सिकाई बताई जाती है और खानपान ठीक करने को कहा जाता है। इसी से यह समस्या ठीक हो जाती है। नीचे दी गई दवाओं में से कोई एक ली जा सकती है।

- पंचसकार चूर्ण या सुश्रुत चूर्ण एक चम्मच रात को गर्म दूध या गर्म पानी से रोजाना लें।
- अशोर्घिनी वटी की दो गोली सुबह-शाम खाने के बाद पानी से लें।
- खाने के बाद अभयारिष्ट या कुमारी आसव चार-चार चम्मच आधा कप पानी में मिलाकर लें।
- मस्सों पर लगाने के लिए सुश्रुत तेल आता है। इसका प्रयोग कर सकते हैं।
- प्रोटोस्कोप के जरिये डॉक्टर क्षार का एक लेप लगाते हैं, जिससे मस्से सूख जाते हैं।
- त्रिफला, इसबगोल भी सोते वक्त लिए जा सकते हैं।
- दर्द बढ़ जाए तो एक टब गर्म पानी में एक चुटकी पौटेशियम परमैंग्नेट डालकर सिकाई करें। यह सिकाई हर मल त्याग के बाद करें। पाइल्स कैसे भी हों, अगर सूजन और दर्द है तो गर्म पानी की सिकाई करनी चाहिए।

2. क्षारसूत्र चिकित्सा
- स्टेज 2 और 3 के पाइल्स हैं तो आयुर्वेद में सबसे ज्यादा प्रभावशाली पद्धति क्षारसूत्र चिकित्सा अपनाई जाती है।
- इस तरीके में एक मेडिकेटेड धागे का उपयोग किया जाता है, जिसे क्षारसूत्र कहते हैं। इस धागे को एक खास तरीके से कुछ आयुर्वेदिक दवाओं से बनाया जाता है।
- क्षारसूत्र चिकित्सा करने के लिए डॉक्टर पहले पाइल्स के मस्सों को प्रोटोस्कोप नाम के यंत्र से देखते हैं और उसके बाद मस्सों की जड़ में इस धागे को लीगेट कर देते हैं।
- मस्सों की जड़ों में एक जगह ऐसी होती है, जहां दर्द नहीं होता। इस जगह पर ही इस क्षारसूत्र को लीगेट किया जाता है।
- मस्सों को अंदर कर दिया जाता है और धागा बाहर की ओर लटकता रहता है।- इस पूरे प्रोसेस को करने के बाद मरीज को घर भेज दिया जाता है।
- पूरी तरह ठीक होने में दो हफ्ते का वक्त लगता है।
- इस दौरान इस धागे के जरिये दवाएं इंजेक्ट होती रहती हैं और मस्सों को सुखाकर गिरा देती हैं। मस्से गिरने के साथ ही धागा भी अपने आप गिर जाता है।
- इन दो हफ्तों के दौरान डॉक्टर मरीज को एक-दो बार देखने के लिए बुलाते हैं और यह आकलन करते हैं कि प्रक्रिया ठीक चल रही है और कितना फायदा हो रहा है।
- इन दो हफ्तों के दौरान मरीज को कुछ दवाओं का सेवन करने के लिए कहा जाता है और ऐसी चीजें ज्यादा खाने की सलाह दी जाती है, जो कब्ज दूर करने में सहायक हों। गर्म पानी की सिकाई और कुछ व्यायाम भी बताए जाते हैं।
- क्षारसूत्र चिकित्सा के लिए अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती। उसी दिन मरीज को घर भेज दिया जाता है।
- लोकल एनैस्थिसिया के तहत यह प्रकिया की जाती है।
- इस तरीके से इलाज के बाद पाइल्स के दोबारा होने की आशंका खत्म हो जाती है।
- खर्च: 5 से 10 हजार रुपये के बीच आता है।

ध्यान रहे-
- पाइल्स के मस्सों में बस खून आता है, दर्द नहीं होता। जिन लोगों को दर्द महसूस होता है, उसकी वजह पाइल्स में हुआ इंफेक्शन है। ऐसे मरीजों के इंफेक्शन को पहले दवाओं से ठीक किया जाता है और उसके बाद ही उनकी क्षारसूत्र चिकित्सा की जाती है।
- इस क्षेत्र में कई झोलाछाप डॉक्टर भी इलाज करते हैं और बड़े-बड़े दावे करते हैं। आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज के लिए ऐसे डॉक्टरों के पास ही जाएं जिनके पास सही डिग्री है। क्षारसूत्र चिकित्सा क्वालिफाइड आयुर्वेद चिकित्सक से ही करवाएं.

योग
- अगर इन योग क्रियाओं को नियम से किया जाए तो पाइल्स होंगे ही नहीं:
कपालभाति, अग्निसार क्रिया, पवनमुक्तासन, मंडूकासन, अश्विनी मुदा। शंख प्रक्षालन क्रिया भी कब्ज दूर करने सहायक है, इसलिए तीन-चार महीने में एक बार इस क्रिया को करने से कब्ज नहीं होती और पाइल्स की समस्या नहीं होती।
- अगर पाइल्स हैं तो गणेश क्रिया की जा सकती है। कोई भी योगिक क्रिया किसी योग्य योग गुरु से सीखकर ही करें।

डाइट-
पाइल्स में यह जानना ज्यादा जरूरी है कि क्या न खाएं।
क्या न खाएं
- नॉन वेज।
- मिर्च मसाले वाला खाना।
- केक पेस्ट्री और मैदे से बनी चीजें।
- जंक फूड और तैलीय खाना।
- चाय कॉफी-अल्कोहल और बीयर।

क्या खाएं
- पपीता, चीकू, अंजीर, केला, नाशपाती, अंगूर, सेब जैसे फल।
- सलाद जैसे गाजर मूली आदि।
- हरी पत्तेदार सब्जियां।
- चोकर वाला आटा, मल्टिग्रेन ब्रेड।
- दूध, फलों के जूस और बटर मिल्क जैसे दूसरे लिक्विड।
- दिन में आठ गिलास पानी

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